आज ज़िन्दगी वीरान सी है,
तेरे बिन अनजान सी है,
गुम हो गई हो तुम किन गलियों में,
ये सोच सोच कर हो गई बेजान सी है!
शायद मेरी ही कोई खता हो,
पर मुझको इतना तो बता दो,
खता की सज़ा मौत दी होती,
पर ये ज़िन्दगी तेरे बिन बर्दाश्त नही होती!
अब इस दिल में दर्द नही होता,
लगता है कि अब दिल नही रोता,
काश इस सीने में दिल ही ना होता,
तो तेरी मोहोब्बत में न खोता!
अब आँख के आसू सूख गए हैं,
अब दिल के अरमा रूठ गए हैं,
अब कोई मन को भाता नही है,
अब कोई इतना करीब आता नही है!
तुम मेरी मोहोब्बत कि इब्तेदा थी,
तुम्ही मेरी मोहोब्बत कि इंताहा हो,
तुम्ही से शुरू हुई जो मोहोब्बत,
तुम्हारे ही नाम पे वो फ़िदा हो!
मैं सदा चाहूँगा तुम्हे ख़ुद से बढ़कर,
खुदा से माँगूगा तुम्हे हर शे से बढ़कर,
अगर मेरी मोहोब्बत में है सच्चाई रत्ती भर,
तो तुम आओगी मेरे ही घर!!!
Wednesday, August 5, 2009
Sunday, May 3, 2009
हाल-ए-दिल लफ्जों में बया करते हो, तो महबूबा का नाम बताने से क्यों डरते हो!
नूर-ए-इश्क छुपाए नहीं छुपता, तो शम्मा को बेपर्दा करने से क्यों डरते हो?
नूर-ए-इश्क छुपाए नहीं छुपता, तो शम्मा को बेपर्दा करने से क्यों डरते हो?
Saturday, April 11, 2009
दीपा प्रकाश जम्बूर,
लगती है जैसे हूर,
आदत से है मजबूर,
कर देतीहै सबकी tension दूर!
दिखती है ये बुद्धू जैसी,
पर सिर्फ दिखती ही ऐसी,
असल में है बड़ी निराली,
पांच भाषा जानने वाली!
पर मुझे अभी तक इसने,
इक भी भाषा नहीं सिखाई,
बोहोत ही simple सीधी साधी,
पर online नहीं सिखाती
!
चल अब तो तू दिल्ली आ जा,
online छोड़, class में सिखा जा,
दो साल में मुझको भी,
तू Language Expert बना जा!
चल अब जल्दी दिल्ली आ जा!!!
लगती है जैसे हूर,
आदत से है मजबूर,
कर देतीहै सबकी tension दूर!
दिखती है ये बुद्धू जैसी,
पर सिर्फ दिखती ही ऐसी,
असल में है बड़ी निराली,
पांच भाषा जानने वाली!
पर मुझे अभी तक इसने,
इक भी भाषा नहीं सिखाई,
बोहोत ही simple सीधी साधी,
पर online नहीं सिखाती
!चल अब तो तू दिल्ली आ जा,
online छोड़, class में सिखा जा,
दो साल में मुझको भी,
तू Language Expert बना जा!
चल अब जल्दी दिल्ली आ जा!!!
Friday, February 13, 2009
Wednesday, December 31, 2008
Happy New year
खुशियों भरा आसमा हो,
कमियाबी की हो ज़मीन,
खुदा करे के आपका नया साल,
हो महफूज़ और रंगीन!
Sunday, November 30, 2008
मेरी प्रेयसी...
सूरज को मचलते देखा,
दिन में चाँद निकलते देखा,
जब तुम सामने आए तो,
खुद को हमने पिघलते देखा!
यौवन की इक गागर हो तुम,
रूप का गहरा सागर हो तुम,
झिलमिल तारों की चादर हो तुम,
मेरे प्रेम का आदर हो तुम!
इक बार तो ब्रम्ह भी तुमको रचकर,
मन ही मन इतराया होगा,
इतनी सुन्दर रचना मेरी,
यह सोच के वो मुस्काया होगा!
उसके इस गर्व की मूरत को मैं अपना बनाना चाहता हो,
हे रूपसी तेरे प्रेम को अब मैं पाना चाहता हूँ!
दिन में चाँद निकलते देखा,
जब तुम सामने आए तो,
खुद को हमने पिघलते देखा!
यौवन की इक गागर हो तुम,
रूप का गहरा सागर हो तुम,
झिलमिल तारों की चादर हो तुम,
मेरे प्रेम का आदर हो तुम!
इक बार तो ब्रम्ह भी तुमको रचकर,
मन ही मन इतराया होगा,
इतनी सुन्दर रचना मेरी,
यह सोच के वो मुस्काया होगा!
उसके इस गर्व की मूरत को मैं अपना बनाना चाहता हो,
हे रूपसी तेरे प्रेम को अब मैं पाना चाहता हूँ!
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